I wrote this poem when i was in first year of my BE i.e around 10 years back and now i would like to share it with you.
आज मै अकेला हूं, एसा लग रहा है मुझको
सब -कुछ होते हुए भी , कुछ नहीं लग रहा है मुझको
आज मै अकेला हूं, एसा लग रहा है मुझको
कुछ पल पहले सारा जहाँ मेरे साथ था , आज ये जहाँ तनहा लग रहा है मुझको
बस तेरी याद आ रही है , तू मेरे साथ है एसा लग रहा है मुझको आज मै अकेला हूं, एसा लग रहा है मुझको
कभी ज़माने के साथ चलना चाहता हूँ , कभी ज़माने से दूर जाना चाहता हूँ
आज फिर कुछ गलती कर रहा हूँ , एसा लग रहा है मुझको
आज मै अकेला हूं, एसा लग रहा है मुझको
"अकेला "